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रोजी रोटी की वजह से घर छोड़ कर आए थे, उसी के मौहताज हो कर पैदल ही घर लौट रहें हैं प्रवासी मजदूर

कोरोना समय में अगर सबसे ज्यादा कोई पिसता दिख रहा है तो वह वर्ग जो अपनी रोजाना की आय पर ही निर्भर रहते हैं। ऐसे में इन प्रवासी मजदूरों के अपने राज्य से दूर होने की पीड़ा साफ दिखाई दे रही है। अब इस समय में कुछ ना कर पाने वाले बेचारे मजदूर दो वक्त की रोटी भी नहीं खा पा रहे हैं, यही कारण हैं कि देश के अलग अलग राज्यों से अब इन लोगों ने अपने घरो की तरफ पलायन करना शुरू कर दिया है। ऐसा ही एक नजारा जो कभी राजधानी दिल्ली में देखा गया था, वैसा ही कुछ महाराष्ट्र में देखने को मिल रहा है। यंहा लॉकडाउन के बार बार बढ़ने के कारण मजदूरों ने पैदल ही निकलना शुरू कर दिया है।

ना शरीर पर कपड़े ना घर पंहुचने का कोई इंतजाम

महाराष्ट्र के ज्यादातर नेशनल हाईवे पर आपको एक ऐसी भीड़ दिखाई देगी, जैसे कोई कुंभ का मेला ही लग गया हो, लोग पैदल , अपनी साईकिल, काले पीले ऑटो और ट्रकों से चल कर अपने इस सफर को पूरा कर रहे हैं। हालांत कितने गंभीर हैं आप इस बात का अंदाजा ऐसे लगा सकते हैं कि ना शरीर पर कपड़े हैं और ना ही पैरों में चप्पल खाने को अगर कुछ मिल पाता है तो वह भी तब जा रास्ते में कोई एनजीओं या सरकार द्वारा कुछ मुहैया कराया जाए।

एक वक्त के खाने के लिए धूप में नंगे पैर चलना पड़ता है

इन मजदूरों का दर्द शायद ना सरकार समझ सकती है और ना ही वह लोग जो अपने अपने घरों में एसी कमरों में बैठ कर भी लॉकडाउन से परेशान हैं। यह प्रवासी मजदूर ज्यादातर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और झारखंड से हैं। इनसे बात करने पर मालूम होता है पैरो में पड़े छाले इन्हे कंही सुकून से बैठने को तो कहते हैं, लेकिन घर पंहुचने की मजबूरी में वह सुकून से बैठ भी नहीं सकते। कई मजदूरों से बात करने पर मालूम हुआ की यह लोग अक्सर रात को ही सफर करना चाहते हैं, लेकिन इस जलाने वाली धूप में भी इसलिए ही चलना पड़ता है ताकि एक वक्त का खाना तो नसीब हो।

किस बात की आजादी और कैसा विश्व गुरू बनने का सपना

यह हमारे देश की कैसी दशा है यह समझ पाना बहुत मुश्किल है, एक तरफ हम देश में बुलेट ट्रेन, रॉकेट साइंस की बात करते हैं, दूसरी तरफ देश के ज्यादातर लोग दो वक्त की रोटी का इंतजाम नहीं कर पाते। यह तो कोरोना की बात है, लेकिन सच तो यह भी है कि ना जाने कितने ही लोग हर रोज भूख से तड़प कर मर जाते हैं। देश की आजादी के इतने वर्ष बाद भी हमारे देश में लोगों को जरूरी सुविधाएं तक नही मिल पा रही हैं और हम सपना देख रहे हैं विश्व गुरू बनने का।

Nishant

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