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सवाल कई पर जवाब नहीं, कोरोना के समय में मजदूरों का ध्यान नहीं रख पाई सरकार, सवाल विपक्ष पर भी

कोरोना वायरस के चलते किए गए लॉकडाउन में यूं तो बहुत सी चीजों को छूट मिल गई है, लेकिन बावजूद इसके प्रवासी मजदूरों की तकलीफ पर कोई विराम लगता नहीं दिख रहा है। लगभग दो महीने के इस लॉकडाउन में यह मजदूर अलग अलग राज्यों से निकल कर पैदल ही अपने घर का रास्ता तय कर रहे हैं (GOVT FAILED TO HELP MIGRANT WORKERS)। आजादी के इतने वर्ष बाद भी देश में गरीबी आज भी अपनी चरम सीमा पर है, महज दिन के 100-200 रूपए कमाने वालें लोगों के बारे में सरकार द्वार क्यों नहीं सोचा गया, क्यों आखिर पहले लॉकडाउन से ही इनके लौट कर जाने का इंतजाम नहीं किया गया(GOVT FAILED TO HELP MIGRANT WORKERS)। ऐसे में कई सवाल है जिनकी जवाब देही केंद्र सरकार और राज्य सरकार की है, लेकिन ऐसा मालूम होता है कि सब पर्दे के पीछे छिप कर अपने आप को बचाने की कोशिश कर रहें हैं।

क्या सीखा हमने दूसरे देश के हालातों से (GOVT FAILED TO HELP MIGRANT WORKERS)

पहला सवाल सरकार से यह है कि क्या वह नहीं जानते थे कि कोरोना को भयंकर रूप लेने से नहीं रोका जा सकता। अगर नहीं तो हमने बाकी देशों की हालत से क्या सीखा, लॉकडाउन सही निर्णय था इसमें कोई दो राय नहीं है, लेकिन अगर यह लॉकडाउन इतना ही लंबो होना था, तो मजदूरों के घर लौटने की व्यवस्था पहले लॉकडाउन से ही क्यों नहीं की गई(GOVT FAILED TO HELP MIGRANT WORKERS)। अगर घऱ लौटने का इंतजाम नही किया गया तो भी ठीक है, लेकिन इन लोगों के खाने पीने के पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं किए गए। इस सब के बीच राज्य सरकारों ने खुद की क्या जिम्मेदारी निभाई, एक महामारी के दौर में आज भी हम यह पता करने में अस्मर्थ हैं कि किन लोगों को सरकार की मदद की जरूरत है और किन को नहीं।

विपक्ष पर भी उठता है सवाल

क्या आजादी के इतने वर्ष के बाद भी सरकार के पास लोगों का इतना डेटा भी नहीं है कि वह यह पता लगा पाए कि किन लोगों के पास मासिक आय है और किन के पास नहीं, यह सवाल विपक्ष पर भी उठता है कि अगर पिछले 70 सालों में सरकार के पास इतना डेटा भी नहीं है तो क्या सच में आजादी मिली है।

मजदूर घर वापसी मिशान क्यों नहीं बनाती सरकार

इन प्रवासी मजदूरों की मजबूरी का दर्द शायद ना तो कोई राजनीतिक पार्टी समझ रही है और ना ही कोई और। ये कितने मजबूर हैं कि अगर कोई अफवाह भी उड़ जाए कि इस स्टेशन या बस स्टैंड से राज्यों के लिए बसे चल रही हैं, तो यह बेचारे  इतनी भयंकर गर्मी में नंगे पैर ही वंहा पंहुच जाते हैं। हालांकि इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि इन मजदूरों की संख्या इतनी है कि चाह कर भी इन्हे जल्दी वापिस नहीं भेजा जा सकता लेकिन सरकार की तरफ से वंदे भारत जैसे मिशन की तरह मजदूर वापसी मिशन भी बनाया जाना चाहिए और जल्द से जल्द इन मजदूरों के घऱ वापिस भेज देना चाहिए।

Nishant

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